संघ और उसके क्षेत्र & नागरिकता

भाग –1 ” अनुच्छेद 1 से 4 तक”

अनुच्छेद 1 – भारत ‘राज्यों का सघ’ होगा तथा नाम भारत और इण्डिया दिया गया है।

अनुच्छेद 2 – भारत की संसद अर्जीत क्षेत्रों को भारतीय संघ में मिला सकती है।

अनुच्छेद 3 – भारत की संसद दो या दो से अधिक राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है।उनके क्षेत्र को घटा बढा सकती है। उनके नामों में परिवर्तन कर सकती है ऐसा करने से पूर्व संम्बन्धित राज्य के विधान मण्डल की सहमति लेना आवश्यक है। लेकिन राष्ट्रपति द्वारा मानना या न मानना उसके विवेक पर निर्भर करता है।

अनुच्छेद 4 – अनुच्छेद 3 की व्यवस्था को अनुच्छेद 4 के अन्तर्गत संविधान में संशोधन नहीं माना जायेगा अर्थात् अनुच्छेद 368 की प्रक्रिया में इसे शामिल नहीं किया गया।

भाग-2 नागरिकता- अनुच्छेद 5 से 11 तक

नागरिकता दो प्रकार की होती है एक जन्मजात और दुसरी अर्जित।

जन्मजात नागरिकता वहां के मुल निवासीयों के पास होती है तथा अर्जित नागरिकता को संवैधानिक प्रावधानों के द्वारा प्राप्त किया जाता है।

भारतीय संसद द्वारा नागरिकता अधिकर अधिनियम 1955 बनाया गया जिसके आधार पर नागरिकता के प्रावधान तय किये गये है।

नागरिकता प्रदान करना और उसे समाप्त करना भारतीय संसद के अधिकार क्षेत्र में रखा गया है।

अप्रवासी भारतीयों को दोहरी नागरिकता दी गई है।

7 से 9 जनवरी 2003 से अप्रवासी भारतीय सम्मेलन का आयोजन एल. एम. सिंघवी समिति के सिफारिश के आधार पर तय किया गया। प्रथम अप्रवासी भारतीय सम्मेलन(2003) नई दिल्ली में आयोजित किया तथा 12 वां अप्रवासी भारतीय सम्मेलन जनवरी 2014 में नई दिल्ली किया गया।

अनुच्छेद 11 के अन्तर्गत नागरिकता का स्वेच्छा से त्याग तथा स्वेच्छा से ग्रहण करना निर्धारण किया गया है। भारतीय नागरिकता में अपवाद – जम्मू कश्मीर क्योंकि वहां अलग संविधान है।

भाग -3 मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35 तक) (अमेरिका से लिये)

मौलिक अधिकारों से तात्पर्य वे अधिकार जो व्यक्तियों के सर्वागिण विकास के लिए आवश्यक होते है इन्हें राज्य या समाज द्वारा प्रदान किया जाता है।तथा इनके संरक्षण कि व्यवस्था की जाती है।

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 10 दिसम्बर 1948 को वैश्विक मानवाधिकारो की घोषणा की गई इसलिए प्रत्येक 10 दिसम्बर को विश्व मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है।

भारतीय संविधान में 7 मौलिक अधिकारों का वर्णन दिया गया था।

समानता का अधिकारा – अनुच्छेद 14 से 18 तक

स्वतंन्त्रता का अधिकार – अनुच्छेद 19 से 22 तक

शोषण के विरूद्ध अधिकार – अनुच्छेद 23 व 24

धार्मिक स्वतंन्त्रता का अधिकार – अनुच्छेद 25 से 28 तक

शिक्षा एवम् संस्कृति का अधिकार – अनुच्छेद 29 और 30

सम्पति का अधिकार – अनुच्छेद 31

सवैधानिक उपचारो का अधिकार – अनुच्छेद 32

अनुच्छेद – 12 राज्य की परिभाषा

अनुच्छेद – 13 राज्य मौलिक अधिकारों का न्युन(अतिक्रमण) करने विधियों को नहीं बनाऐंगा।

44 वें संविधान संशोधन 1978 द्वारा “सम्पति के मौलिक अधिकार” को इस श्रेणी से हटाकर “सामान्य विधिक अधिकार” बनाकर ‘अनुच्छेद 300(क)’ में जोड़ा गया है।

वर्तमान में मौलिक अधिकारों की संख्या 6 है।

समानता का अधिकार- अनच्छेद 14 से अनुच्छेद 18

अनुच्छेद – 14 विधी कके समक्ष समानता ब्रिटेन से तथा विधि का समान सरंक्षण अमेरिका से लिया

अनुच्छेद – 15 राज्य जाती धर्म लिंग वर्ण, आयु और निवास स्थान के समक्ष भेदभाव नहीं करेगा।

राज्य सर्वाजनिक स्थलों पर प्रवेश से पाबन्दियां नहीं लगायेगा।

अनुच्छेद 15(3) के अन्तर्गत राज्य महीलाओं और बालकों को विशेष सुविधा उपलब्ध करवा सकता है।

अनुच्छेद – 16 लोक नियोजन में अवसर की समानता(सरकारी नौकरीयों में आरक्षण का प्रावधान)

अनुच्छेद 16(1) राज्य जाती, धर्म, लिंग वर्ण और आयु और निवास स्थान के आधार पर नौकरी प्रदान करने में भेदभाव नहीं करेगा लेकिन राज्य किसी प्रान्त के निवासियो को छोटी नौकरीयों में कानुन बनाकर संरक्षण प्रदान कर सकता है।

अनुच्छेद 16(4) के अन्तर्गत राज्य पिछडे वर्ग के नागरिको को विशेष संरक्षण प्रदान कर सकता है।

इसमें भुमिपुत्र का सिद्धान्त दिया गया है।

अनुच्छेद – 17 अस्पृश्यता/छुआ छुत का अन्त – भारतीय संसद ने अस्पृश्यता निशेध अधिनियम 1955 बनाकर इसे दण्डनिय अपराध घाषित किया है।

अनुच्छेद – 18 उपाधियों का अन्त किया गया है राज्य सैन्य और शैक्षिक क्षेत्र के अलावा उपाधि प्रदान नहीं करेगा(वर्तमान में समाज सेवा केा जोड़ा गया) ।उपाधि ग्रहण करने से पुर्व देश के नागरिक तथा विदेशी व्यक्तियों को राष्ट्रपति की अनुमति लेना आवश्यक है।

स्वतन्त्रता का अधिकर- अनुच्छेद 19 से 22 तक

अनुच्छेद – 19 में सात प्रकार की स्वतंन्त्रता दी गई थी 44 वें संविधान संशोधन 1978(सम्पति अर्जित की स्वतन्त्रता हटा दिया)

अनुच्छेद 19(1)(क) – भाषण या अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता

– प्रैस और मिडिया की स्वतंन्त्रता

– सुचना प्राप्त करने का अधिकार – 12 अक्टूबर 2005 से जोड़ा।

अनुच्छेद 19(1)(ख) – शान्ति पूर्वक बिना अस्त्र-शस्त्र के सम्मेलन करने की स्वतन्त्रता।

अपवाद – सिखों को कटार धारण करने का अधिकार।

अनुच्छेद 19(1)(ग) – संघ या संगम बनाने की स्वतंन्त्रता।

अपवाद – सैन्य संगठन और पुलिस बल संघ नहीं बना सकते है।

अनुच्छेद 19(1)(घ) – बिना बाधा के घुमने – फिरने की स्वतंन्त्रता ।

अनुच्छेद 19(1)(ड़) -व्यापार या आजिविका कमाने की स्वतन्त्रता।

अनुच्छेद 19(1)(च) – सम्पति अर्जन की स्वतन्त्रता(हटा दिया)

अनुच्छेद 19(1)(छ) – स्थायी रूप से निवास करने की स्वतन्त्रता।

अपवाद – जम्मू – कश्मीर।

अनुच्छेद – 20 अपराधों के दोषसिद्ध के सम्बन्ध में सरंक्षण प्राप्त करने का अधिकार।

अनुच्छेद 20(1) किसी व्यक्ति को तब तक अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जाता है जब तक लागु कानुन का उल्लगन न किया हो।

अनुच्छेद 20(2) किसी व्यक्ति के लिए एक अपराध के लिए दण्डित किया जा सकता है।

अनुच्छेद 20(3) किसी व्यक्ति को स्वंय के विरूद्ध गवाही देने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 20 और 21 आपातकाल में निलम्बित नहीं किया जाता।

अनुच्छेद – 21 प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता का अधिकार।

अनुच्छेद 21(क) 86 वां संविधान संशोधन 2002, 6-14 वर्ष के बालकों को निशुल्क् अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, 1 अप्रैल 2010 से सम्पुर्ण भारत में लागु।

अनुच्छेद – 22 कुछ दशाओं में गिरफ्तारी से संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार, इसमें निवारक ,निरोधक विधि भी शामिल है।

अनुच्छेद 22(1) गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को उसके कारण बताने होंगे।

अनुच्छेद 22(2) उसे वकील से परामर्श प्राप्त करने का अधिकार।

अनुच्छेद 22(3) 24 घंटे में सबंधित न्यायलय में पेश करना होगा – यात्रा व अवकाश का समय शामिल नहीं।

निवारक निरोध विधि के अन्तर्गत – शत्रु देश के नागरिक को गिरफ्तार किया जाता है या ऐसी आशंका ग्रस्त व्यक्तियों को गिरफ्तार किया जाता है इन्हें उपर के सामान्य (22(1),(2),(3)) अधिकार प्राप्त नहीं है।

शोषण के विरूद्ध अधिकार-अनुच्छेद 23 से अनुच्छेद 24

अनुच्छेद – 23 इसमें मानव का अवैध व्यापार, दास प्रथा, तथा बेगार प्रथा को पूर्णतय प्रतिबन्धित किया गया है। अपवाद – राज्य किसी सार्वजनिक प्रयोजन के लिए अनिवार्य श्रम लागू कर सकता है।

अनुच्छेद – 24 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को उद्योग धन्धों में काम पर नहीं लगाया जाता है। अर्थात् बाल श्रम प्रतिबन्धित किया गया है।

वर्तमान में ऐसी आयु के बालको को घरेलु कार्यो में भी नहीं लगाया जा सकता है।

धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार – अनुच्छेद 25 से 28

अनुच्छेद – 25 अन्तकरण के आधार पर धर्म को मानने की स्वतन्त्रता ।

अनुच्छेद – 26 माने गये धर्म के प्रबंधन करने की स्वतन्त्रता(प्रबन्धन- चल और अचल सम्पति का)।

अनुच्छेद – 27 राज्य किसी धर्म की अभिवृदि पर धार्मिक आधार पर कोई कर नहीं लगायेगा।

अनुच्छेद – 28 सरकारी वित्त पोषित विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा नहीं दि जा सकती है। लकिन किसी विन्यास(ट्रस्ट) द्वारा स्थापित विद्यालय में कुछ प्रावधानों के अन्तर्गत धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है। लेकिन इसमें सभी को बाध्य नहीं किया जा सकता है।

शिक्षा और संस्कृति का अधिकार-अनुच्छेद 29 से अनुच्छेद 30

यह अधिकार अल्पसंख्यक वर्गो को प्राप्त है।

अनुच्छेद – 29 राज्य के अन्तर्गत रहने वाला प्रत्येक नागरिक को अपनी भाषा, लिपी और संस्कृति को सुरक्षित और संरक्षित करने का अधिकार है।

अनुच्छेद – 30 भाषा,लिपी और संस्कृति की सुरक्षा हेतु सभी अल्पसंख्यक वर्गो को अपनी पसन्द की शिक्षण संस्थान की स्थापना करने का अधिकार है ऐसी संस्थाओं में प्रवेश से वंचित नहीं किया जायेगा।

संवैधनिक उपचारों का अधिकार-अनुच्छेद – 32

डाॅ. अम्बेडकर ने इसे संविधान की आत्मा कहा है।

मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु 5 प्रकार कि रिटे जारी करता है ताकि मौलिक अधिकारों को उचित संरक्षण प्रदान किया जा सके।

  1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण – हैवस काॅरपस
  2. परमादेश – मैण्डमस
  3. प्रतिषेध – प्रोहिविजन
  4. उत्प्रेषण – सैरिसिरियो
  5. अधिकार पृच्छा – क्यू वारेन्टो
  6. इन रिटो को न्याय का झरना कहा जाता है।

1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण – यह नागरिक अधिकारों की सर्वोत्तम रिट है। बंदी बनाये गये व्यक्ति को 24 घण्टे में न्यायलय बंदी बनाये गये कारणों की समीक्षा करता है।

2. परमादेश – किसी सार्वजनिक पदाधिकारी द्वारा गलत आदेश दिया जाता है तो इसके कारणों की समीक्षा न्यायलय करता है।

3. प्रतिषेध – मना करना – सर्वोच्च न्यायलय अपने अधिनस्थ न्यायलय को सीमा से बाहर जाकर कार्य करने को मना करता है।

4. उत्प्रेषण – ओर अधिक सुचित करना- सर्वोच्च न्यायलय अपने अधिनस्थ न्यायलय से और अधिक सुचना मांगता है।

5. अधिकार पृच्छा – किसी अधिकार से किसी सार्वजनिक पदाधिकारी द्वारा जब कोई पद वैद्य या अवैद्य तरीके से प्राप्त किया जाता है तो उसके कारणों की समीक्षा करता है।

रिट 3 और रिट 4 न्यायलय से न्यायलय में परिवर्तीत कि जाती है।

भाग – 4 नीति निर्देशक तत्व(अनुच्छेद 36 से 51) – आयरलैण्ड से लिये

अनुच्छेद – 36 राज्य की परिभाषा का वर्णन किया गया है।

अनुच्छेद – 37 नीति निर्देशका तत्व के हनन होने पर न्यायलय की शरण संभव नहीं है।

अनुच्छेद – 38 लोक कल्याणकारी राज्य तथा उसकी नीतियों का वर्णन किया गया है।

अनुच्छेद – 39 राज्य भौतिक और अभौतिक साधनों के सकेन्द्रण को रोकेगा। राज्य महिलाओं व बालकों और पुरूषों की सभी अवस्था ध्यान रखेगा।

समान कार्य के लिए समान वेतन की व्यवस्था रखी गई है।

अनुच्छेद – 39(क) निःशुल्क विधिक सहायता प्राप्त करने का अधिकार ।

अनुच्छेद – 40 राज्य ग्राम पंचायतों को बढावा देकर उन्हे शक्तियां प्रदान करेगा।

अनुच्छेद – 41 राज्य आर्थिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछडे वर्गो का विशेष ध्यान रखेगा।

अनुच्छेद – 42 कार्य की न्यायोजित(उचित) दशाऐं बनाऐगा तथा महिलाओं को निःशुल्क प्रसुति सहायता उपलब्ध करायेगा।

अनुच्छेद – 43 उद्योगों के प्रबन्धन में मजदुरों या श्रमिकों के भाग लेने का अधिकार ।

अनुच्छेद – 43(क) सहकारी समितियों की स्थापना 97 वां संविधान संशोधन, 2011

अनुच्छेद – 44 राज्य समान नागरिक संहिता को लागु करने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद – 45 राज्य 6 से 14 वर्ष के बालको को निःशुल्क अनिवार्य शिक्षा देने की व्यवस्था करेगा। 86 वां संविधान संशोधन, 2002

अनुच्छेद – 46 राज्य एस. टी. और एस. सी. तथा दुर्बल वर्गो के हितों का ध्यान रखेगा।

अनुच्छेद – 48 राज्य कृषि और पशुपाल को वैज्ञानिक तरीके से बढावा देगा।

अनुच्छेद – 48(क) राज्य पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद – 50 राज्य कार्यपालिका और न्यायपालिका का पृथक्करण करेगा।

अनुच्छेद – 51 भारत की विदेश नीति का वर्णन जो शान्ति पुर्ण सहअस्तित्व तथा अन्तराष्ट्रीय पंच निर्णयों पर आधारित है।

भाग 4(क) मौलिक कत्र्तव्य – रूस(मुल सविधान में मौलिक कर्तव्य नहीं थे।)

अनुच्छेद 51(क) 42 वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों के आधार पर जोड़े गये। इनके संख्या 10 रखी गई। वर्तमान में 11 है।

11 वां मौलिक कर्तव्य- 86 वें संविधान संशोधन 2002 से जोड़ा गया। प्रत्येक माता – पिता/ संरक्षक/अभिभावक को अपने 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को शिक्षा दिलाने का कर्तव्य निर्धारित किया गया है।

भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह-

1. संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे

2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को ह्रदय में संजोए रखे और उनका पालन करे

3. भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे

4. देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे

5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म . भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुंद्ध है

6. हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करे

7. प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखे

8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे

9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे

10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू ले

11. यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथास्थिति, बालक या प्रतिपाल्य के लिए शिक्षा के अवसर प्रदान करे

राष्ट्रपति – अनुच्छेद 52 राष्ट्रपति पद का प्रावधान किया गया है।

अनुच्छेद – 53 संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी जिसका प्रयोग वह प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार करेगा।

अनु़च्छेद – 54 राष्ट्रपति का निर्वाचक मण्डल इसमें संसद और विधानसंभाओं के निर्वाचित सदस्य भाग लेते है। 70 वां संविधान संशोधन 1992 द्वारा दिल्ली और पांडिचेरी को इसके अन्तर्गत शामिल किया गया है।

राष्ट्रपति के निर्वाचन में मनोनीत तथा विधान परिषदों के सदस्य भाग नहीं लेते है।

अनुच्छेद – 55 निर्वाचन की विधि

निर्वाचन एकलसंक्रमणीय अनुपातिक मत पद्धति से होता है। इसे थाॅमस हेयर ने दिया इसलिए इसे हेयर पद्धति भी कहा जाता है।

निर्वाचन की विधि के अन्तर्गत भारत में अनुपातिक समानता को रखा गया है। राष्ट्रपति के निर्वाचन में एक एम. एल. ए. या विधायक का मत मुल्य उस राज्य की कुल जनसंख्या(जनगणना 1971) अनुपात उस राज्य की विधानसभा के कुल निर्वाचित सदस्यों की संख्या भाग 1000 होती है।

1 विधायक का मत मुल्य = (राज्य की कुल जनसंख्या (जन. 1971)/उस राज्य की विधान सभा के कुल निर्वाचित सदस्यों की संख्या)*(1/1000)

राष्ट्रपति के निर्वाचन में वैद्य मतों का कोटा निकाला जाता है। तथा वरीयता के आधार पर मत मुल्य हासिल किया जाता है। वरीयता में जितने उम्मीदवार होते है उतने मत देने का अधिकार होता है।

84 वां संविधान संशोधन, 2001 जनसंख्या को अनुपात 2026 तक अपरिवर्तित रहेगा।

अनुच्छेद – 56 राष्ट्रपति का कार्यकाल या पद अवधि

सामान्यतय 5 वर्ष या उसे अनुच्छेद 61 के अन्र्तगत कार्यकाल से पूर्व महावियोग से हटा सकते है। या अपना त्याग पत्र उपराष्ट्रपति को देता है। उपराष्ट्रपति इसकी सुचना लोकसभा अध्यक्ष को देता है।

अनुच्छेद – 57 राष्ट्रपति पुर्ननिर्वाचित होने की योग्यता

अनुच्छेद -58 राष्ट्रपति बनने की योग्यता

  • वह भारत का नागरिक हो
  • आयु 35 वर्ष
  • वह किसी लाभ के पद पर कार्यरत न हो उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, मंत्री लाभ के पद नहीं है।
  • उसमें लोकसभा सदस्य बनने की योग्यता हो।

अनुच्छेद – 59 राष्ट्रपति पद के लिए शर्त

वह शासकीय आवास का प्रयोग करेगा। पद अवधि के दौरान उसके वेतन भत्तों में कटौती संभव नहीं है। उसे वेतन भारत की संचित निधि से दिया जाता है।

नोट- राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए 50 प्रस्तावक व 50 अनुमादक आवश्यक है। जमानत राशि – 15,000 रूपये। कुल वैध्य मतों का 6 हिस्सा प्राप्त करना आवश्यक। निर्वाचन की अवधि दो सप्ताह या पन्द्रह दिन।

अनुच्छेद – 60 राष्ट्रपति की शपथ

सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायधीश अनुपस्थिति में वरिष्टम न्यायधिश द्वारा शपथ दिलाई जाती है।

अनुच्छेद – 61 महावियोग

1/4 सदस्यों के प्रस्ताव पर 14 दिन की पूर्व सुचना राष्ट्रपति को देनी होती है। ऐसा प्रस्ताव संसद के 2/3 बहुमत से प्रस्तावित है। अभी तक किसी राष्ट्रपति पर महावियोग प्रस्ताव नहीं लाया गया है।

अनुच्छेद – 62 राष्ट्रपति पद की आकस्मिक रिक्तिता

राष्ट्रपति की शक्तियां

राष्ट्रपति की व्यवस्थापिका अन्तर्गत शक्तियां

1. अनुच्छेद 79 के अन्तर्गत राष्ट्रपति संसद या व्यवस्थापिका का अभिन्न अंग है।

2. अनुच्छेद 80(2) के अन्तर्गत राष्ट्रपति राज्य सभा में 12 सदस्यों को मनोनित करता है।

3. अनुच्छेद 331 के अन्तर्गत दो सदस्यों को(एंग्लो इंडियन) लोक सभा में मनोनित करता है।

4. अनुच्छेद 85 के अन्तर्गत राष्ट्रपति संसद का सत्र आहुत, सत्रावसान और भंग करने का अधिकार।

5. अनुच्छेद 86 प्रत्येक सत्र के प्रारम्भ में तथा नवगठित लोक सभा का पहला सत्र तथा संयुक्त् अधिवेशन को अभिभाषित(भाषण) करता है।

अनुच्छेद – 87 संसद का प्रत्येक वर्ष का प्रथम स्तर राष्ट्रपति अभिभाषित करता है इसका भाषण मत्रिमण्डल द्वारा तैयार किया जाता है।

अनुच्छेद – 99 इसके अन्तर्गत राष्ट्रपति प्रोटेम स्पीकर (अस्थायी अध्यक्ष) की नियुक्ति करता है।

अनुच्छेद -110 धनविधेयक राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से लोकसभा में रखा जाता है। इसे लोकसभा अध्यक्ष प्रमाणीत करता है।

अनुच्छेद – 108 संसद के संयुक्त अधिवेशन को बुलाने का अधिकार

कार्यपालिका सम्बंधी शक्तियां

अनुच्छेद – 53 संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है।

अनुच्छेद – 74 इसमें मंत्रीपरिषद का वर्णन दिया है।

अनुच्छेद – 75 प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा।

अनुच्छेद – 76 महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा।

अनुच्छेद – 148 नियंत्रक व महालेखा की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा।

अनुच्छेद – 155 राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा।

अनुच्छेद – 280 राष्ट्रीय वित्त आयोग की नियुक्ति करने का अधिकार।(1 अध्यक्ष$4 सदस्य)

अनुच्छेद – 338 अनुसुचित जाति, अनुसुचित जनजाति आयोग की नियुक्ति करने का अधिकार।

अनुच्छेद – 340 ओ. बी. सी. आयोग की नियुक्ति का अधिकार।

उच्चायोक्त व विदेशों में राजदूत नियुक्त करने का अधिकार।

सैन्य शक्ति

राष्ट्रपति सेना का सर्वोच्च कमाण्डर होता है।

न्यायीक शक्तियां

अनुच्छेद – 124 इसके अन्तर्गत मुख्या न्यायधीश सहित अन्य न्यायधीश की(सर्वोच्च न्यायलय) न्युक्ति करता है।

अनुच्छेद – 216 के अन्तर्गत उच्च न्यायलय में मुख्य न्यायधीश व अन्य न्यायधीशों की नियुक्ति करता है।

अनुच्छेद – 72 राष्ट्रपति की माफी प्रदान करने का अधिकार – राष्ट्रपति मृत्युदण्ड को पूर्णतय माफ कर सकता है। सजा की अवधि बदल सकता तथा प्रकृति को परिवर्तीत कर सकता है।

अनुच्छेद – 123 राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति।

सिफारिश मंन्त्रीपरिषद या मत्रिमण्डल की अधिकतम अवधि 6 माह और 6 सप्ताह

जब संसद सत्र नहीं चल रहा हो और ऐसे कानुन बनाने की आवश्यकता पड़ जाये जो अपरिहार्थ(अनितात आवश्यक) हो तो राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता है।

इसमं संसद के कानुन के बराबर शक्ति होती है।

राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियां

भाग – 18 अनुच्छेद राष्ट्र आपाल काल का प्रावधान

कारण – युद्ध, युद्ध जैसा वातावरण, आन्तरिक अशान्ति(44 वां संविधान संशोधन 1978 हटा दिया इसकी जगह सशस्त्र विद्रोह रखा है।)

सिफारिश – मंत्रिपरिषद की लिखित।

एक माह में संसद के दो तिहाई बहुमत से पारित होना आवश्यक।

एक बार में 6 माह के लिए लगाया जा सकता हैं।

अब तक तीन बार राष्ट्र आपातकाल लगाया गया है।

अक्टुबर 1962, भारत चीन युद्ध के समय(प. जवाहरलाल नेहरू)

कोलम्बो प्रस्थाव लाया गया – यदास्थिति को बनाये रखने के लिए।

दिसम्बर 1971 – भारत पाक दुसरा युद्ध(वी. वी. गिरी राष्ट्रपति)

3 जुलाई 1972 आन्तरिक आपातकाल इन्दिरा गांधी ने लगाया जो मार्च 1977 तक चला ।(फकरूदीन अली अहमद राष्ट्रपति)

अनुच्छेद – 356 राज्यों में राष्ट्रपति शासन

सिफारिश – मंत्रीमरिषद की लिखित

कारण – राज्यों में शासन सवैधानिक प्रक्रिया से नहीं चालाया जाना

राज्यपाल की सिफारिश या राष्ट्रपति स्वंय घोषणा कर सकता है। इसे दो माह में संसद के 2/3 बहुमत से पारित होना आवश्यक है।

एक बार में 6 माह के लिए तथा लगातार तीन वर्ष तक निर्वाचन एक बार में 6 माह के लिए तथा लगातार तीन वर्ष तक निर्वाचन आयोग की सिफारिश पर लगाया जा सकता है।

सर्वाधिक दस बार उत्तरप्रदेश में उससे कम केरल में 9 बार लगाया। राजस्थान में 4 बार –

1967 मोहन लाल सुखाडिया के समय(सबसे कम समय 44 दिन)

1977 भैरों सिंह शेखावत सरकार के समय

1980 हरदेव जोशी सरकार के समय

1992 भैरोंसिंह शेखावत सरकार के समय(सर्वाधिक समय लगभग 1 वर्ष)

अनुच्छेद – 360 वित्तीय आपातकाल

भारत में अभी तक प्रयोग नहीं किया है।

अनुच्छेद – 111 के अन्र्तगत राष्ट्रपति की किसी विधेयक के हस्ताक्षर के बाद कानून बनाने का अधिकार है। इसमें तीन प्रकार की वीटो की शक्ति 1. पूर्ण वीटो 2. अत्यातिक वीटो 3. पाॅकिट वीटो।

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