भारत का संवैधानिक विकास | Constitutional Development of India

भारत का संवैधानिक विकास | Constitutional Development of India

1- 1773 का विनियमन अधिनियम (भारत का संवैधानिक विकास)

2- पिट्स इंडिया एक्ट 1784 (भारत का संवैधानिक3- विकास)3-

3-1813 का चार्टर अधिनियम (भारत का संवैधानिक विकास)

4-1833 का चार्टर अधिनियम (भारत का संवैधानिक विकास)

5-1853 का चार्टर अधिनियम (भारत का संवैधानिक विकास)

6- भारत सरकार अधिनियम 1858 (भारत का संवैधानिक विकास)

7-1861 का भारतीय परिषद अधिनियम (भारत का संवैधानिक विकास)

8- भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 (संवैधानिक विकास)

9- भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 (मॉर्ले-मिंटो सुधार)

10- भारत सरकार अधिनियम, 1919 (भारत का संवैधानिक विकास)

11- भारत सरकार अधिनियम 1935 (भारत का संवैधानिक विकास)

12- भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 (भारत का संवैधानिक विकास)

1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट (भारत का संवैधानिक विकास)

  • भारत का संवैधानिक विकास हेतु कंपनी द्वारा शासन के लिए पहली बार एक लिखित संविधान प्रस्तुत किया गया। इस अधिनियम के माध्यम से ब्रिटिश सरकार द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियमित और नियंत्रित करने की दिशा में प्रथम प्रयास किया गया था।
  • बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल बना दिया गया तथा उसे परामर्श देने हेतु 4 सदस्यीय कार्यकारिणी परिषद का गठन किया गया। मद्रास तथा बम्बई के गवर्नर इसके अधीन हो गये।
  • इस अधिनियम के अंतर्गत कलकत्ता प्रेसीडेंसी में एक ऐसी सरकार स्थापित की गई, जिसमें गवर्नर जनरल और उसकी परिषद के 4 (फिलिप फ्रांसिस, क्लेवरिंग, मानसन और वारवेल) सदस्य थे, जो अपनी शक्ति का उपयोग संयुक्त रुप से करते थे।
  • संवैधानिक विकास के लिए कंपनी के साथ शासन पर संसदीय नियंत्रण स्थापित किया गया। अधिनयम के तहत प्रथम गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स बनाए गए।
  • कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय की स्थापना 1774 में की गई। इसे सिविल, आपराधिक, नौसेना तथा धार्मिक मामलों में अधिकारता प्राप्त थी। अन्य न्यायाधीश नियुक्त किये गये। इसका न्यायाधिकार क्षेत्र बंगाल, बिहार, उड़ीसा तक था। इसके मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे तथा अन्य न्यायाधीश चेम्बर्ज, लिमैस्टर और हाइड थे।
  • कम्पनी के कर्मचारी को निजी व्यापार करने और भारतीय लोगों से परितोष एवं उपहार लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया। इस अधिनियम के तहत कोर्ट ऑफ डायरेक्टर के माध्यम से ब्रिटिश सरकार का कंपनी का शासन अधिक सशक्त हो गया।
  • संवैधानिक विकास के चरण में पिट्स इंडिया एक्ट लाया गया। इसका नाम ब्रिटेन के तत्कालीन युवा प्रधानमंत्री विलियम पिट के नाम पर रखा गया था। इसके तहत भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्र को पहली बार ब्रिटिश आधिपत्य का क्षेत्र कहा गया।
  • इस अधिनियम के माध्यम से ब्रिटिश सरकार का कंपनी के कार्यों और प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण हो गया। इस अधिनियम द्वारा बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल (नियंत्रण परिषद) की स्थापना की गयी जिसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार भारत में कंपनी के नागरिक, सैन्य और राजस्व कार्यों पर पूर्ण नियंत्रण रखती थी।
  • इसके अतिरिक्त, अभी भी भारत के साथ व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार बना रहा और उसे कंपनी के अधिकारियों को नियुक्त करने या हटाने का अधिकार प्राप्त था। अतः ब्रिटिश भारत पर ब्रिटिश सरकार और कंपनी दोनों के शासन अर्थात् द्वैध शासन की स्थापना हुई।

1813 का चार्टर अधिनियम (भारत का संवैधानिक विकास)

  • कंपनी का भारतीय व्यापार पर एकाधिकार समाप्त हो गया। ईसाई धर्म प्रचारकों को भारत में धर्म प्रचार करने की स्वीकृति प्रदान की गई। सभी ब्रिटिश व्यापारियों को भारत से व्यापार करने की छूट प्रदान कर दी गई।
  • कंपनी की आय से भारतीयों की शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष 1 लाख रूपये व्यय करने का प्रावधान किया गया।

1833 का चार्टर अधिनियम (भारत का संवैधानिक विकास)

  • इस अधिनियम के तहत बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया। गवर्नर जनरल में नागरिक और सैन्य शक्तियाँ निहित थीं। भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक थे।
  • इस अधिनियम के तहत मद्रास और बंबई के गवर्नरों को विधायिका संबंधी शक्ति से वंचित कर दिया गया। भारत के गवर्नर जनरल को संपूर्ण ब्रिटिश भारत में विधायिका के असीमित अधिकार प्रदान कर दिए गए।
  • इस अधिनियम के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी विशुद्ध रूप से प्रशासनिक निकाय बन गई। इसके तहत सर्वप्रथम सिविल सेवकों के चयन हेतु खुली प्रतियोगिता का आयोजन प्रारंभ करने का प्रावधान किया गया था किंतु कोर्ट ऑफ डायरेक्टर के विरोध के कारण इस प्रावधान का क्रियान्वयन नहीं हो सका।
  • गवर्नर जनरल की परिषद् में एक चौथा सदस्य विधि विशेषज्ञ के रूप में शामिल किया गया। प्रथम विधि विशेषज्ञ सदस्य मैकाले था।

1853 का चार्टर अधिनियम (भारत का संवैधानिक विकास)

  • इसके अंतर्गत पहली बार गवर्नर जनरल की परिषद के विधायी एवं प्रशासनिक कार्यों को पृथक कर दिया गया। इस अधिनियम के तहत सिविल सेवकों की भर्ती एवं चयन हेतु खुली प्रतियोगिता का शुभारंभ हुआ। अतः अब सिविल सेवा में भारतीय नागरिक भी भाग ले सकते थे।
  • इस अधिनयम के अंतर्गत पहली बार भारतीय केंद्रीय विधान परिषद् में स्थानीय प्रतिनिधित्व प्रारंभ किया गया था। विधि सदस्य को गवर्नर जनरल की परिषद् का पूर्ण सदस्य बना दिया गया था।

1858 का भारत शासन अधिनियम (भारत का संवैधानिक विकास)

  • भारत में कम्पनी के शासन को समाप्त कर शासन का उत्तरदायित्व ब्रिटिश संसद (क्राउन) को सौंप दिया गया।
  • इसके तहत भारत में बोर्ड ऑफ कंट्रोल और कोर्ट ऑफ डायरेक्टर को समाप्त कर दिया गया। अतः द्वैध शासन समाप्त हो गया।
  • ब्रिटिश साम्राज्ञी की ओर से भारतीय प्रशासन का संचालन राज्य सचिव द्वारा किया जाना था, जिसकी सहायता के लिए 15 सदस्यीय सलाहकारी परिषद का गठन किया गया।
  • भारत के गवर्नर जनरल का नाम ‘वायसराय’ (क्राउन का प्रतिनिधि) कर दिया गया तथा उसे भारत सचिव की आज्ञा के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य किया गया। इस प्रकार भारत का प्रथम वायसराय लॉर्ड कैनिंग बना।
  • भारत मंत्री को वायसराय से गुप्त पत्र व्यवहार तथा ब्रिटिश संसद में प्रतिवर्ष भारतीय बजट पेश करने का अधिकार दिया गया।

1861 का भारत परिषद् अधिनियम (भारत का संवैधानिक विकास)

  • इसके तहत वायसराय की विधान परिषद की संख्या में वृद्धि की गयी। अब इस परिषद में न्यूनतम 6 और अधिकतम 12 सदस्य शामिल हो सकते थे। उनमें से कम-से-कम आधे सदस्यों का गैर-सरकारी होना आवश्यक था। इस अधिनियम के तहत मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसियों को विधायी शत्तिफ़याँ पुनः प्रदान करके विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई।
  • वायसराय को विधायी कार्यों हेतु नये प्रांतों का निर्माण करने तथा नव-निर्मित प्रांतों में गवर्नर या लेफ्रिटनेंट गवर्नर की नियुत्तफ़ करने का अधिकार प्रदान किया गया।
  • वायसराय को परिषद् की संतुति के बिना अध्यादेश जारी करने का अधिकार प्रदान किया गया। ऐसे अध्यादेश की अवधि 6 माह थी। इस अधिनियम ने लॉर्ड कैनिंग द्वारा 1859 में प्रारंभ विभागीय प्रणाली को मान्यता प्रदान की।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 (संवैधानिक विकास)

  • विधि निर्मात्री संस्थाओं को प्रश्न पूछने तथा बजट पर बहस करने का अधिकार प्रदान किया गया। यद्यपि मतदान का अधिकार नहीं था।
  • इसके माध्यम से केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में अतिरित्तफ़ (गैर-सरकारी) सदस्यों की संख्या में वृद्धि कर दी गई।

भारतीय परिषद् अधिनियम, 1909 (मार्ले-मिंटो सुधार)

  • यह सुधार 1906 में आगा खां के नेतृत्व में मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल द्वारा वायसराय लॉर्ड मिंटो से पृथक निर्वाचन प्रणाली के परिप्रेक्ष्य में किया गया था।
  • लॉर्ड मार्ले- भारत के राज्य सचिव
  • लॉर्ड मिंटो- भारत के वायसराय

प्रमुख प्रावधानः

  • केंद्रीय और प्रांतीय परिषदों के सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गई। मुस्लिम समुदाय हेतु पहली बार पृथक निर्वाचन व्यवस्था की व्यवस्था की गई।
  • वायसराय की कार्यकारिणी में एक भारतीय सदस्य की नियुक्ति करने का प्रावधान किया गया। ऐसे प्रथम भारतीय सदस्य सत्येन्द्र सिन्हा थे। इस अधिनियम के माध्यम से विधान परिषदों में विचार-विमर्श के विषयों में वृद्धि की गई। उदाहरण के लिए, लोकहित के विषय पर संकल्प प्रस्तावित करना आदि।

भारत शासन अधिनियम, 1919 (भारत का संवैधानिक विकास)

  1. मोन्टेग्यु- भारत सचिव
  2. लॉर्ड चेम्सफोर्ड- वायसराय
  3. इसमें एक प्रस्तावना भी जोड़ी गई। द्विसदनीय केंद्रीय व्यवस्थापिका का प्रावधान एवं प्रत्यक्ष निर्वाचन का प्रावधान किया गया। लंदन में भारत के उच्चायुक्त के कार्यालय का सृजन किया गया।
  4. इस अधिनियम के अंतर्गत एक वैधानिक आयोग का गठन किया गया। इस आयोग का कार्य दस वर्ष जांच करने के पश्चात् अपनी रिपोर्ट सौंपना था।
  5. संप्रदायिक आधार पर पृथक निर्वाचन को विस्तारित करके, इसमें ईसाईयों, आंग्ल-भारतीयों और यूरोपियों को भी शामिल कर लिया गया। सांप्रदायिक चुनाव क्षेत्रों को और अधिक व्यापक बनाया गया, केवल उन लोगों को मताधिकार प्रदान किया गया जो एक निश्चित धनराशि सरकार को कर के रुप में देते थे।
  6. प्रांतो में दोहरे शासन प्रबंध की स्थापना की गयी अर्थात आरक्षित विषयों का प्रशासन गवर्नर अपनी कार्यकारिणी द्वारा करता था और हस्तांतरित विषयों का प्रशासन गवर्नर अपने भारतीय मंत्रियो की सहायता से करता था। गवर्नर जनरल की परिषद के सदस्यों में से 3 सदस्यों का भारतीय होना आवश्यक था।

1935 का भारतीय शासन अधिनियम (भारत का संवैधानिक विकास)

  • 1932 में तैयार किए गए एक श्वेत पत्र (वाइट पेपर) पर आधारित था, इसमें कोई प्रस्तावना नहीं थी। इसमें अखिल भारतीय संघ जिसमे 11 ब्रिटिश प्रांत, 6 चीफ कमिश्नर क्षेत्र तथा स्वेच्छा से सम्मिलित होने वाली देसी रियासतें सम्मिलित थीं।
  • केंद्र व उसकी इकाइयो के बीच तीन सूचियां संघ सूची, राज्य सूची व समवर्ती सूची बनाए गई, जिसमे क्रमशः 59, 54 और 36 विषय थे।
  • हस्तान्तरित विषयों का प्रकाशन गवर्नर-जनरल व मंत्रियों को सौंपा गया। मंत्री विधान मण्डल के सदस्यों में से चुने जाते थे तथा उसके प्रति उत्तरदायी होते थे। इस अधिनियम में एक अखिल भारतीय संघ की व्यवस्था की गयी।
  • अवशिष्ट शक्तियां गवर्नर जनरल में निहित थीं। इसके तहत 11 प्रांतो में से 6 प्रांतो में भी द्विसदनात्मक व्यवस्था का प्रारंभ हुआ।
  • प्रांतो में द्वैध शासन समाप्त कर दिया गया, उन्हें स्वतंत्र एवं स्वशासन का अधिकार दिया गया, किंतु गवर्नर को विशेष अधिकार प्रदान किये गए।
  • केंद्र में द्वैध शासन की स्थापना तथा मताधिकार का विस्तार किया गया। शक्तियों का विभाजन केंद्र तथा प्रांतो में किया गया तथा संघीय न्यायालय की स्थापना की गई।
  • भारतीय परिषद का अंत कर दिया गया तथा सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति का विस्तार किया गया। ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता बनी रही तथा बर्मा, बराड़ एवं अदन को भारत से पृथक कर दिया गया।
  • बर्मा (वर्तमान म्यांमार) को भारत से अलग कर दिया गया। इस अधिनियम के तहत 1937 एक संघीय न्यायालय एवं ‘रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया’ की स्थापना की गयी।
  • 1958 में स्थापित भारत परिषद को समाप्त कर दिया गया।

भारत स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 (भारत का संवैधानिक विकास)

  • 3 जून 1947 को प्रस्तुत की गई माउंटबेटन योजना के आधार पर ब्रिटिश संसद ने 4 जुलाई, 1947 को भारत स्वतंत्रता अधिनियम पारित कर दिया तथा इसे 18 जुलाई, 1947 को सम्राट द्वारा अनुमति प्रदान कर दी गई।
  • 15 अगस्त 1947 को यह लागू कर दिया गया। भारत को एक स्वतंत्र व संप्रभुता संपन्न राज्य घोषित किया गया। इसमें 15 अगस्त 1947 से दो डोमिनियन राज्य भारत तथा पाकिस्तान की स्थापना की गई।
  • दोनो राज्यों के लिए ब्रिटिश सरकार पृथक-पृथक और यदि दोनों सहमत हों तो संयुक्त गवर्नर जनरल नियुक्त करेगी। दोनों राज्य अपनी-अपनी संविधान सभा में अपने देश के लिए संविधान का निर्माण कर सकते हैं।
  • जब तक नया संविधान नहीं बनेगा, तब तक शासन 1935 के अधिनियम के अनुसार चलेगा।
  • ब्रिटिश सरकार 15 अगस्त, 1947 के पश्चात दोनो राज्यों पर कोई भी नियंत्रण नहीं रखेगी। इन राज्यों की व्यवस्थापिकाओं द्वारा बनाए गए कानून को इस आधार पर निरस्त नहीं किया जाएगा।

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